नागौर के इतिहास प्रसिद्ध वीर राव अमरसिंह राठौड़ ने आगरा दुर्ग के शाही दरबार में बख्शी सलाबत खां को कटार से मार डाला था । राव अमरसिंह के इस साहसिक कार्य से आतंकित होकर बादशाह शाहजहां, दाराशिकोह दरबार स्थित सिंहासन त्याग कर अन्तःपुर में भाग गये थे । अमरसिंह को शाही दरबार की मर्यादा उल्लंघन से रुष्ट होकर शाहजादा दारा- शिकोह की आज्ञा से खलीलुल्लाखां और राजगढ़ (अजमेर) के शासक अर्जुन गौड़ प्रभृति छह शाही योद्धाओं ने सामूहिक धावा बोल कर मार डाला । अमरसिह के वीरगति प्राप्त करने का यह सम्वाद प्राप्त होने पर उसके साथ के पन्द्रह अंगरक्षक वीर मीर तुजुक मीरखां और दौलतखाना खासा के मुंशी मलूकचन्द को मार कर लड़ते हुए काम आये ।
आगरा दुर्ग में घटित इस घटना की जानकारी जब आगरा में विद्यमान राठौड़-योद्धाओं को मिली तो वे उत्तेजित हो उठे और अमरसिंह के प्रतिशोध रूप में अर्जुन गौड़ को मारने के लिए उद्यत हुए । इस योजना का नेतृत्व भार राठौड़ वीर बलभद्र (बल्लू जी) चांपावत हरसोलाव के स्वामी और भाऊसिंह कूंपावत ने ग्रहण किया । बलभद्र और भाऊसिंह पहिले राव अमरसिंह की सेवा में रह चुके थे । परन्तु घटनाकालीन वर्षो में वे अमरसिंह की सेवा त्याग कर शाही मन्सबदारी पा चुके थे ।
बलभद्र चांपावत ( जन सामान्य में बल्लूजी के नाम से प्रसिद्ध ) राव अमरसिंह की भांति ही दुधर्षवीर, स्वाभिमानी और निर्भीक व्यक्ति थे । वह मारवाड़ के पाली संस्थान के स्वामी राव गोपालदास चांपावत के पुत्र थे । गोपालदास के कुल आठ पुत्र थे, जिनमें हाथीसिंह बीकानेर के राव दलपतसिंह को शाही - कारा से मुक्त कराते हुए अजमेर में और विट्ठलदास शाहजादों के उत्तराधिकार के उज्जैन में लड़े गए युद्ध में मारे गए थे । शेष पुत्रों में भी एक के अतिरिक्त सभी वीर रणभूमि में जूझते हुए गति को प्राप्त हुए थे 1
शाहजहां ने बलभद्र के नेतृत्व में अर्जुन गौड़ पर आक्रमरण करने की सूचना प्राप्त होने पर राठौड़ योद्धाओं को समझा कर शान्त करने के प्रयास किये । परन्तु राठौड़ों में राव अमरसिंह के निधन को लेकर उग्र क्रोध था और वे प्रतिशोध में अर्जुन गौड को मारने का संकल्प ले चुके थे । बादशाह द्वारा राठौड़ों को शान्त करने के प्रयत्नों का वर्णन फारसी ग्रंथों और राजस्थानी ख्यातों तथा काव्यकृतियों में उपलब्ध होता है ।
राव अमरसिंह की मृत्यु और राठौड़ बलभद्र चांपावत के प्रतिशोध में लड़े गए आगरा के उस युद्ध का वर्णन प्रबन्ध काव्यों और मुक्तक रचनाओं में बड़ी प्रभावशाली शैली और सशक्त भाषा में मिलता है । बलभद्र द्वारा प्रदर्शित वीरता का वर्णन तत्कालीन चारण कवियों ने अपने वीर गीतों में किया है । वीर बलभद्र चांपावत के समकालीन प्रसिद्ध कवि केशवदास गाडरण अकेले ने ही उस एक ही घटना पर चार गीत रचे हैं । यहां वे गोत प्रस्तुत किये जा रहे हैं ।
प्रथम गीत में बादशाह शाहजहां द्वारा वीरवर बलभद्र को अर्जुन गौड़ पर आक्रमण न करने की आज्ञा के उत्तर में बलभद्र के इस कथन का वर्णन किया गया है कि नागौर के राव अमरसिंह को अकेले स्वर्ग में भेजकर आगरा में युद्ध करने का अवसर हम राठौड़ फिर कब प्राप्त करेंगे ? हम राव अमरसिंह के उमराव रहे हैं और सदैव दूसरों की आपत्ति को भी अपने सिर झेलने को उद्यत रहे हैं. फिर अपने स्वामी अमरसिंह का वैर न लेना हमें कैसे सहन हो सकता हैं ! बादशाह के पास ऐसा सन्देश और शाही जागीर का पट्टा प्रेषित कर वह वीर जूझ पड़ा । गीत इस प्रकार है-
बिजड़ ऊठियौ धूण गिरमेर रौ बहादर, पछै म्हैं कदे अवसांण पावाँ ।
अमर ने सुरग दिस मेल ने अेकलौ, आगरे लड़ेवा ' कदे आवां ॥ १॥
अम्हैं तो अमर राजा तरणा ऊमरा, जुड़ेवा पारकी छठी जागां" ।
बोलियो बलू पतासह रै बरोबर, मारुवे " " राव रौ वैर मांगां ॥२॥
केसरया मांहि गरकाब बागो करै, सेहरो बांध हलकार साथै
अमर रौ भतीजौ तोल खग आखवै , बलू अर आगरौ बाथै ॥3॥
पटा नांखि भिड साह सू चटपट, कांम नवकोट सांचों कमायौ ।
वाद कर साह सूं वैर नृप वोढियो, अमर ने मुहर करि सुरग आयौ॥४॥
परमवीर बलभद्र शाही मन्सबदारी प्राप्त करने के पूर्व नागौर में अमरसिंह के सामन्त थे । राव अमरसिंह और बलभद्र में मेषों की निगरानी के प्रश्न को लेकर परस्पर अनबन हो गई थी । तब बलभद्र ने नागौर की जागीर का त्यागकर महाराणा मेवाड़ की सेवा अंगीकार कर ली थी । किन्तु उसके स्वाभिमान ने वहां भी उसे अधिक दिन बने न रहने दिया और उदयपुर छोड़कर शाही सेवा ग्रहण करने को तैयार होना पड़ा। राव अमरसिंह पर रुष्ट होते हुए भी उनकी मृत्यु के पश्चात् बलभद्र ने उस विरोध को नगण्य माना और राव अमरसिंह के वैर-शोधन के लिए शस्त्र सभांले तथा शाही पट्टा फेंक कर वह मुगल सेना से जा भिड़ा । गीत में नवीन प्राप्त पट्टा के त्यागने तथा पुराने पट्टे के लिए प्राणोत्सर्ग करने का वर्णन हुआ है । द्वितीय गति की पंक्तियां हैं-
अमर राव वाळे दिवसि दाव जाणै अभंग सूरवर साथि लीधां समेळा ।
पटै जो हूतौ बलू पतसाह रै, बळू भेळौ हुवौ मरण वेळा ॥१॥
तण गजण साथि भाराथ चित तेवड़ै त्यार भड़ मुहर आगळी खत्री ताइ ।
असुर रौ वित खावतौ खत्री अंत रै, अंत रै तंतर सुज मेळिवौ आई ॥
जोधपुर सुपह री चाड माडे जुड़ण, आपरा लियां परिग्रह उजासे
पाल रौ खूंद वरतणि जुदी पांगतौ पूजियौ विघनची वार पासै॥ ३
मारियौ सुण पतसाह राव अमरसी, साह सू मांनि जुध भवां सारू
मरण दिन पटौ परहरि नवौ मौड़ बांधि, मुवौ जूना पटा साथि मारू ॥४
केशवदास मारवाड़ के छीडिया ग्राम का निवासी था । वह राव अमरसिंह के स्वभाव और ठाकुर बलभद्र के पराक्रम, पौरुष और शौर्य के प्रति आश्वस्त था । अमरसिंह के लड़ाई में मारे जाने के पूर्व वह अनेक बार अमरसिंह और बलभद्र से मिला होगा। इसी- लिए उसने गजगज नामक वीरगीतो में बलभद्र के रण क्रिया- कलापों का विवाह के साथ सावयव रूपक का नियोजन कर अपनी काव्य शक्ति का प्रकाशन किया है । कवि श्रेष्ठ केशवदास ने वीरवर बलभद्र को दुलहा और शाही सेना को दुलहिन बना कर गीत का अनूठा गठन किया है। प्रतिपक्षी सेना के योद्धाओं के सिर का रक्षा उपकरण लोह टोप नायिका का सुहाग चिह्न रखड़ी है । उनके प्रखर ही लंहगे है । शरीर कवच ही कंचुकी है। कमर में धारित तलवार और कटार उसकी कटिमेखला है । बाणों के प्रहार उस चंचला के नेत्रों के चपल कटाक्ष हैं । छत्तीस आयुध सोलह शृंगार और हाथों का वलय है। हाथियों पर फहराती पताकाएं उस सेना रूपी नायिका की वेणी तथा ध्वजान के दण्ड बेणी की ग्रांटी है । गजघण्टों की ध्वनि नायिका के पद- नूपुरों का निनाद है | कण्ठाभूषण और चीर सन्नाह है | मांगलिक गीत गायिकाओं का कार्य अप्सराओं ने सम्पन्न किया है । यह विचित्र विवाह आगरा मण्डप पर रचा गया। घोड़ों की हिनहिन ध्वनि ही वेद ध्वनि है और नारद बेद मन्त्रों द्वारा प्राणिग्रहण- क्रिया सम्पन्न करवा रहे हैं । अन्त में आयुधों के खण्ड-खण्ड होने को ग्रंथी बन्धन का छूटना, रणभूमि की सैज पर सोना रंग - शैय्या पर शयन और गृद्ध, चील्ह, भूत-प्रेतों की तृप्ति को दावत तथा दहेज को यश रूप में चित्रित कर रूपकालंकार का सुन्दर निर्वाह किया गया है ।
कवि ने बलभद्र यानी बल्लू जी चाम्पावत पर और भी गीत लिखें है जिन्हें पढने के लिए ठाकुर सौभाग्य सिंह जी शेखावत, भगतपुरा द्वारा लिखित पुस्तक "पूजां पांव कविसरां" पढ़ें |

